हर एक दुख ने किसी अजीब मोह में मुझे छुआ,हे मेरी आत्मा की चाह — किसने इतना सताया मुझे? इतनी नफ़रत तो कभी मेरे दिल में नहीं थी,सोच — किसने यह ज़हर पिलाया मुझे? फिर कोई ताज़ा टीस दिल की तहों में उतर गई,फिर किसी सपने ने आईना दिखाया मुझे। किसने लूटा है मेरे विचारों की पवित्रता?ओ मेरे तपते दिल — किसने चुरा लिया मुझे? तेरी चीख़ें भी एक दिन ये दुनिया सुनेगी,अगर तूने मुझे रुलाया है, हे समझौतावादी! मैं बस यही सोचकर चुप हूँ — किसी भी तरह सही,दर्द…
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